Sunday, November 24, 2013

विकल्प की अकाल मौत की कोशिश

आम आदमी पार्टी यानी 'आप' के लिए यह संकट का समय है। कई लोग काफी खुश हैं, खासतौर से वे लोग, जो शुरू से ही 'आप' को संदेह की नजर से देखते थे। कुछ वे भी हैं, जो इससे ईष्र्यादग्ध थे और अरविंद केजरीवाल की कामयाबी से जल रहे थे। कई ऐसे भी हैं, जो केजरीवाल की कामयाबी से जुड़कर अपनी कामयाबी का रास्ता तलाश रहे थे और जब एंट्री नहीं मिली, तो उसको बरबाद करने में जुट गए। पर ये हमले पहली बार नहीं हुए हैं। पहले भी गंभीर आरोप लगे और आगे भी लगेंगे। लेकिन चुनाव के ठीक पहले इस संकट ने एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। सवाल साख का है, और राजनीतिक मजबूती का भी है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या इस संकट का सामना करने का माद्दा 'आप' के नेतृत्व में है? मुझे ध्यान है कि जब अन्ना ने आंदोलन शुरू किया था, तब भी समाज के एक तबके को शिकायत थी। खासतौर से अंग्रेजीदां तबके को गांव-देहात का एक बुजुर्ग और उसके साथ सामान्य कद-काठी का एक मध्यम वर्गीय लड़का पसंद नहीं आ रहा था। तब तीन तरह के तर्क दिए गए थे। एक, अन्ना जिस जन-लोकपाल की मांग कर रहे हैं, वह भारतीय संविधान के बुनियादी नियमों के खिलाफ है। हमारा संविधान सत्ता के संतुलन पर आधारित है, जबकि जन-लोकपाल इस संतुलन को खत्म कर देगा।
दो, अन्ना हजारे का आंदोलन पूरी राजनीतिक व्यवस्था को ही डिस्क्रेडिट कर रहा है, जिससे अंत में अराजकता पैदा होगी और पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है। तीन, इस आंदोलन के कारण सरकार, नौकरशाही ने काम करना बंद कर दिया है, क्योंकि हर वह आदमी, जो फैसले ले सकता है, वह अंदर से डर गया है कि कहीं उसे जेल न जाना पड़े। इस वजह से सरकार लकवे का शिकार हो गई और विकास की गति ठहर गई। मैंने तब भी लिखा था कि ये तीनों ही तर्क बेबुनियाद हैं। जन-लोकपाल का मतलब यह कतई नहीं था कि मौजूदा राज-व्यवस्था के खिलाफ एक समानांतर व्यवस्था खड़ी हो। जन-लोकपाल की मांग समाज में क्रांति का आह्वान नहीं, बल्कि मौजूदा व्यवस्था को अंदर से ठीक करने की एक कोशिश थी। इसलिए रामलीला मैदान का अन्ना का अनशन तीन मांगों के माने जाने पर खत्म हो गया था। इसके केंद्र में था सरकार और नौकरशाही में जवाबदेही व पारदर्शिता लाने का वायदा। अगर लोकपाल देश में समानांतर व्यवस्था खड़ा करने का उद्यम होता, तो सरकार कानून बनाने का प्रयास कतई नहीं करती। फिर यह आरोप अन्ना पर कैसे लगाया जा सकता था कि वह राजनीति को डिस्क्रेडिट कर रहे हैं, जबकि राजनीति पहले से ही अपनी साख खो चुकी है।
आज नेताओं पर लोगों को यकीन नहीं है। हर आदमी यह मानता है कि राजनीति पैसा कमाने का धंधा है। तमाम सर्वे मेरी बात की तस्दीक करते हैं। यह बात भी मेरे गले कभी नहीं उतरी कि आंदोलन की वजह से सरकार को लकवा मार गया। मेरे लिए यह एक दार्शनिक सवाल है। क्या भारत को भ्रष्टाचार के सहारे सुपर पावर बनना चाहिए? अगर ऐसा होता है, तो क्या यह स्थिति आम आदमी और देश के लिए सुखद व स्थायी होगी? मेरा मानना है कि भ्रष्टाचार के बल पर खड़ी की गई इमारत ज्यादा नहीं चलती। वह किसी न किसी दिन भरभरा कर गिरती ही है और तब भारत के अस्तित्व को ज्यादा बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। दरअसल, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की साख को खत्म करने के लिए इस तरह के तर्क गढ़े गए और इस प्रक्रम में वे तमाम तत्व एकजुट हो गए, जिनके स्वार्थ को इस आंदोलन से नुकसान होता। यही वजह है कि राजनेता, कारोबारी घरानों व प्रबुद्ध वर्ग की तिकड़ी ने एक ऐसा उपक्रम रचा कि अन्ना का आंदोलन अपने मुकाम तक न पहुंच पाए।
अन्ना और उनकी टीम में दरार डाली गई। एक-दूसरे के खिलाफ लोगों को भड़काया गया और अंत में अन्ना ने अपने आप को पूरी तरह से अलग कर लिया। केजरीवाल ने राजनीति में जाने का फैसला किया और आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ। दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ने का फैसला हुआ। अन्ना ने कई यात्राएं कीं, पर वह नाकामयाब होकर रालेगांव सिद्धि बैठ गए। केजरीवाल के लिए राजनीति नई थी। मुझे भी ज्यादा उम्मीद नहीं थी। लेकिन तमाम सर्वेक्षणों ने 'आप' पार्टी के प्रति लोग की सहानुभूति को साफ दर्शाया। लगने लगा कि यह पार्टी सरकार बनाए या न बनाए, लेकिन यह जरूर तय करेगी दिल्ली में सरकार कौन बनाएगा। महज एक साल में 'आप' का दिल्ली की राजनीति में एक दमदार मुकाम हासिल करना यह दर्शाता है कि लोग स्थापित और परंपरागत राजनीति और राजनीतिक दलों से उब चुके हैं। उन्हें एक सशक्त विकल्प की तलाश है। उन्हें लगता है कि जिस भारत की कल्पना गांधी जी और संविधान निर्माताओं ने की थी, ये वह भारत नहीं है।
इस भारत में करोड़ों रुपये खर्च करके पहले राजनीतिक दलों से टिकट खरीदे जाते हैं और फिर अरबों खर्च करके चुनाव जीते जाते है। सत्ता में आने के बाद खर्च हुए पैसे की उगाही जनता की जेब से की जाती है और भ्रष्टाचार को खुलेआम सही ठहराया जाता है। जब कोई इनके खिलाफ आवाज बुलंद करता है, तो उसको डिस्क्रेडिट करने का कुचक्र होता है। ऐसे मौकों पर प्राय: राजनीतिक मतभेद भुला दिए जाते हैं। 'आप' कोई मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि क्या इस देश में पेशेवर राजनीतिक दल कभी किसी स्वस्थ राजनीतिक विकल्प को अपनी जड़ें जमाने देंगे या नहीं? और मसला यह भी है कि विकल्प की वकालत करने वालों में क्या इतना धैर्य और जीवट है कि वे तमाम झंझावातों से निकलकर अपने मकसद में कामयाब हो सकें? मैं यह दावे से कह सकता हूं कि लोगों के अंदर एक आग धधक रही है, इस आग को अगर सही नेतृत्व मिला, तो हिन्दुस्तान का चेहरा बदल जाएगा और फिर भारत सही मायने में सपनों का देश होगा, असली सुपर पावर!
Source,...Ashutosh IBN7
http://khabar.ibnlive.in.com/blogs/16/941.html

Thursday, November 21, 2013

This is Politics, BJP + Congress, but it will change.

देश कि भ्रष्ट राजनीति ने,…एक स्वक्ष और सुचिता कि राजनीति करने वाली पार्टी आम आदमी पार्टी को दिल्ली चुनाव में होने वाली अप्रत्याशित जीत से रोकने के लिए सिर्फ 5 दिनों में ताबड़तोड़ निम्नलिखित ग्रणित कार्य किये ,.... यहीं से साफ़ हो जाता है कि भ्रष्ट राजनीतिकिस कदर से डरी है आप से। …
Here's the politics if you can see and understand what happened in last 1 week:
1) Some one complains in High court against the "Foreign funding" to AAP. For them NRIs are foreigners.
2) Subramanian Swamy started attacks on AAP without providing any proofs.
3) Home Minister and Congress leader Shushil kumar Shinde starts investigation against AAP funding, of which all details are already open on AAP website.
4) Several motivated groups went to meet Anna ji and gave him many false information. Anna writes a letter to Arvind.
5) Arvind explains it in a Press meet and replies to Anna ji. Again BJP and Congress unitedly attack AAP on TV debates.
6) A BJP worker throws ink on Arvind in the press meet.
BJP leader takes bail of the person who attacked Arvind in press conference.
7) A CD surfaces next day about the same issue in the media.
8 ) Sting operation's edited CD comes in media. And when AAP asked to release full unedited 15 hour video tape so that AAP can verify and take actions if found guilty. Mr. Anuranjan Jha (who did this sting) refuse to share full video to public and AAP.
9) Mr. Anuranjan Jha releases only 48 minute of video to public out of 15 hour long recording. Why he want people to see half and very small part of the truth? What he edited?
10) A FIR being registered against Kumar Vishvas for an old speech he made.

Thursday, November 14, 2013

BJP से कुछ महत्वपूर्ण सवाल जिनके जवाब जनता चाहती है:-

BJP से कुछ महत्वपूर्ण सवाल जिनके जवाब जनता चाहती है:-

१) क्या कारण है की जिन राज्यों में बीजेपी के सरकार है वहां आज तक किसी भी भ्रष्ट कांग्रेस के नेता को जेल नहीं भेजा गया? क्या बीजेपी के अनुसार कांग्रेस के सारे नेता साफ़ सुथरे, इमानदार है? या ये बीजेपी और कांग्रेस के मिली भगत है की लूटेंगे दोनों और एक दुसरे के खिलाफ कुछ नहीं करेंगे?

२) सुब्रमण्यम स्वामी और उमा भरती ने कहा की "राम सेतु" तोड़ने का आदेश बीजेपी की केंद्र में रही सरकार के समय दिया गया था ताकि DMK का समर्थन बीजेपी को मिल सके. तो क्या सिर्फ अपनी सरकार बनाये रखने के लिए बीजेपी राम जी को भूल गयी???
स्वामी जी का विडियो :- http://www.youtube.com/watch?v=q5PpGE5rV_8
उमा भरती का वक्तव्य:- http://www.dnaindia.com/india/report-vajpayee-advani-should-apologise-on-ram-sethu-issue-uma-1131135

३) कारगिल युद्ध के समय जब देश के जाबाज़ सिपाही देश के लिए अपनी जान दे रहे थे तब बीजेपी की सरकार के दौरान "ताबूत घोटाला" जैसा नीच काम हुवा. क्या यही है देश भक्ति? की पैसे दिखे तो युद्ध के समय भी घोटाला करने से बाज़ ना आयें?

४) बीजेपी को कश्मीर का मुद्दा हर 5 साल में चुनाव के ठीक पहले याद आ जाता है. पर क्या कारण है की बीजेपी की सरकार जब 6 साल केंद्र में रही तब किसी भी अलगाव वादी कश्मीरी नेता को जेल में बंद नहीं किया गया, उस पर देशद्रोह का मुकदमा नहीं चलवाया? क्या कारण है की सत्ता में होते हुवे भी कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को बीजेपी ने नहीं हटाया जिसकी मांग वो हमेश चुनाव के ठीक पहले जरुर करते है. क्या इस का कारण "उमर अब्दुल्ला" की नेशनल कांस्फ्रेंस से सरकार बनाने के लिए 1999 में मिला समर्थन था? सत्ता के लिए बीजेपी देश भक्ति और कश्मीर को भूल गयी?

५) दिल्ली में बीजेपी के मुख्य मंत्री पद के प्रत्याशी ने कहा की अगर दिल्ली में बीजेपी की सरकार बनी तो वो शिला दिक्षित और अन्य कांग्रेस के भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कोई जाँच नहीं करवाएंगे. CWG घोटाले की भी जाँच नहीं करवाएंगे. क्या इस तरह से भ्रस्टाचार मिटाएगी बीजेपी? क्यों बचाना चाहती है बीजेपी कांग्रेस के नेताओं को? http://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/no-witch-hunting-if-bjp-comes-to-power-in-delhi-polls-says-harsh-vardhan/articleshow/25262248.cms

६) MCD में पिछले 7 साल से बीजेपी का शाशन है, दिल्ली की जनता MCD (नगर पालिका) के भ्रस्टाचार से त्रस्त है. जब बीजेपी 7 सालों में MCD में भ्रस्टाचार कर रही है तो बीजेपी दिल्ली में कैसे ये दावा करती है की वो सरकार बना कर भ्रस्टाचार मुक्त शाशन देंगे? http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2010-07-19/delhi/28273991_1_corruption-cases-acb-deep-mathur

७) 40% दिल्ली में पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता, 15 साल से विपक्ष में बैठी बीजेपी को जनता का ये दर्द नहीं दिखा? क्यों आवाज नहीं उठाई बीजेपी ने इस बात के लिए? क्यों विधान सभा में सरकार को मजबूर नहीं किया की सारी जनता को पीने का साफ पानी दिया जाये? अब जब आम आदमी पार्टी ने ये मुद्दा उठाया तब जा के बीजेपी को याद आया.

८) MDC (नगर पालिका) के अंतर्गत जो सरकारी स्कूल और अस्पताल आते है उन को बीजेपी अभी तक बहतर क्यों नहीं बना पाई? MDC पर तो बीजेपी का शाशन है न 7 साल से. किसने रोका था जनता की भलाई के लिए काम करने में?

९) पूरी दिल्ली में जब डेंगू फैला हुवा था तब बीजेपी अपनी चुनावी रैली के इंतजाम में लगी हुई थी. सैकड़ो लोग मर गए. क्यों MCD (नगर पालिका) ने समय पर और सभी जगह मछर मारने की दवा का छिडकाव नहीं करवाया?

१०) क्या कारण है की बीजेपी के नेताओं को पाकिस्तान का "मोहम्मद अली जिन्ना" बहुत पसंद है की उन के नेता जब पाकिस्तान जाते है तो जिन्ना की मज़ार पर माथा टेकते है, जिन्ना को सच्चा धर्मनिरपेक्ष बताते है, बीजेपी के नेता जिन्ना की तारीफ में किताबें लिखते है?? बीजेपी के नेता भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चन्द्र बोस आदि पर किताब नहीं लिख सकते थे?

११) तौकीर रज़ा खान को जब 2010 में पुलिस ने बंद किया था तब बीजेपी के एक नेता ने उस की बेल करवाई थी. क्यों???

१२) क्या कारण है की बीजेपी की सरकार मध्य प्रदेश में 10 साल से है उस के बाद भी कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह के खिलाफ कोई भ्रस्टाचार का मामला बीजेपी ने चालू नहीं किया. क्या बीजेपी मानती है की दिग्विजय सबसे इमानदार नेता है? या बीजेपी और कांग्रेस की मिली भगत है?

१३) BSP की नेता मायावती ने कहा था की राम मंदिर की जगह उस जमीन पर शौचालय बनना चाहिए. उस के बाद भी बीजेपी ने मायावती के साथ मिल कर सरकार बनाई. क्यों? मायावती की इस बात और उन के भ्रस्टाचार को बीजेपी भूल गयी थी?

१४) "शिबू सोरेन" जिन पर हत्या का आरोप था और उन को जेल भी हुई थी की पार्टी (JMM) के साथ हाथ मिला आर बीजेपी ने झारखण्ड में सरकार बनाई. क्या बीजेपी को अपराधी और भ्रष्ट नेताओ और पार्टियों से समर्थन लेने में कोई परहेज नहीं है? किसी भी तरह सत्ता में आना ही बस बीजेपी का अंतिम लक्ष्य है?

१५) पूरे देश में सबसे ज्यादा बलात्कार बीजेपी के मध्य प्रदेश में होते है. क्या इस ही तरह की सुरक्षा देगी बीजेपी महिलाओं को? बीजेपी के कई नेताओं के ऊपर बलात्कार के आरोप लगे है बीजेपी ने उन को पार्टी से क्यों नहीं निकला अभी तक?

१६) बीजेपी के वरिष्ट नेता अरुण शौरी ने कहा की बीजेपी और कांग्रेस में कोई अंतर नहीं है, दोनों पार्टी मिल कर समझोते से निर्णय करती है की किस मामले में क्या करना है. तो क्या बीजेपी बस टीवी पर दिखावे की लड़ाई करती है? http://www.rediff.com/news/report/interview-arun-shourie-on-the-real-meaning-of-the-radia-tapes1/20101201.htm — with Arvind Kejriwal and 9 others.

१७) एक तरफ तो बीजेपी कांग्रेस के खिलाफ होने का दावा करती है और दूसरी तरफ बीजेपी के सबसे बड़े वकील नेता "राम जेठ मालानी" 2G मामले में दोषी "कनिमोज़ी" के बचाव में सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते है. ये कैसा विरोध हुवा भाई? ये तो जनता के साथ धोका है. इस के आलावा बीजेपी के ये मशहूर वकील नेता जेसिका लाल के हत्यारे मनु शर्मा, अंडर वर्ल्ड के डॉन "हाजी मस्तान", "लालू यादव", शेयर बाजार के घोटाले बाज़ "हर्षद मेहता", IPL घोटाले के दोषी "ललित मोदी" के भी वकील रहे है. क्या खूब भ्रस्टाचारीयों और अपराधियों से प्रेम है बीजेपी के नेताओं को.

१८) क्या कारण है की बीजेपी जब विपक्ष में होती है तब तो उन्हें "बोफोर्स घोटाला" याद आता है, पर जब बीजेपी की सरकार 6 साल केंद्र में थी CBI उन की जेब में थी तब बीजेपी ने बोफोर्स मामले की जाँच पूरी क्यों नहीं करवाई??? इस मामले को 6 साल में "लोजिकल एंड" पर क्यों नहीं ले गई?

१९) कश्मीरी पंडितों की याद चुनाव के समय जिस बीजेपी को हमेश आती है उस बीजेपी ने 6 साल की सत्ता के समय क्या नयी नीतियाँ बनाई कश्मीरी पंडितों की भलाई के लिए?

२०) 1984 में कांग्रेस ने सिख विरोधी दंगे करवाए थे, उस मामले की जाँच पूरी करवा कर दोषियों को फंसी की सजा क्यों नहीं दिलवाई बीजेपी की केंद्र सरकार ने 6 सालों में?

बस बड़ी बड़ी बाते करना और जनता को मुर्ख बनाना आता है बीजेपी को, पर काम वैसे ही करती है जो कांग्रेस ने किये है. टीवी पर कांग्रेस का विरोध और पीठ पीछे हाथ मिलाना, इस तरह की राजनीती अब इस देश के लोगों को नहीं चाहिए.
 

Tuesday, October 29, 2013

चलो दिल्ली .....पर क्यों चलो दिल्ली ...

चलो दिल्ली .....पर क्यों चलो दिल्ली?...
दोस्त, आपको दिल्ली आना है ...पर क्यों आना है दिल्ली?

दोस्त, आपको दिल्ली इसलिए आना है क्योंकि ....आज तक जितने बार भी ...जब जब भी आप अपने शहर और गाँव में ..मोमबत्ती ले इन्साफ के लिए अपने घर से निकले थे ..उन सारी लड़ाइयों का ....एक निर्णायक युद्ध लड़ा जा रहा है दिल्ली में ...एक इतिहास लिखा जा रहा है दिल्ली में,....और आपको दिल्ली उसी युद्ध में उतरने के लिए आना है .....

ये युद्द है ..भ्रष्ट व्यवस्था और सच्चे लोकतंत्र के बीच ...
ये युद्द है ..पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसे वाली राजनीति ...और देश के सच्ची समाज सेवा वाली राजनीति के बीच ...
ये युद्द है ..उस झूठ और पाखण्ड के खिलाफ ...जिसमे देश कि सर्वोच्च संस्था संसद में बैठ ..हमारे नेताओ ने अच्छे - अच्छे भाषण तो दिए थे ...पर जब करने का नंबर आया तो मुकर गए ...
ये युद्द है ..आम जनता के सम्मान का ...और हमारे नेताओ के अहंकार का ....अरे क्या माँग रही थी देश कि जनता ...क्या मांग रहे थे अन्ना ...सिर्फ जनलोकपाल ..एक ऐसी व्यवस्था जिसमे पारदर्शिता हो ...जो सच्चा लोकतंत्र हो ..स्वराज हो ...पर नहीं दिया ...धोखा दिया ....

धोखा दिया ...और क्या-क्या नहीं कहा ...सड़क पर नहीं बनते कानून .....गटर कीड़ो से बातचीत नहीं होती ..यही कहा था ना ?....याद है कि भूल गए? ....
ये युद्ध है उसी अपमान का ...ये अपमान किसी एक व्यक्ति या संस्था का नहीं था ..
ये अपमान था ..देश कि आत्मा का ...ये अपमान था ...देश कि जनता का ....
अरे जब हमारा संविधान कहता है ....कि जनता के लिए ..जनता के द्वारा ...
तो क्या मतलब बनता है ये कहने का ...कि ...
सड़क पर नहीं बनते कानून .....जनता के कहने से नहीं बनते कानून ....कोई बात नहीं हो सकती गटर के कीड़ो से ...
ये भी कहा गया था ...कि ..
गर चाहिए कानून ...तो लड़ो चुनाव ...और ले लो ...जनलोकपाल ..ले लो स्वराज ...ले लो सम्मान ...
पर ऐसे नहीं देंगे ...चुनाव लड़ो ...और जीत लो ..ले लो ....

किसे चाहिए था "जनलोकपाल"
किसे चाहिए थे "स्वराज" ....
किसका हुआ था अपमान ....जनाब सिर्फ आपका ..इस देश कि जनता का .....
हमारे नेताओ ने ...खुले आम जनता का ...जनता की भावनाओ का ...और उस तरीके का ....
जिस तरीके से ...आज़ाद हुआ था हमारे देश ..खुले आम मजाक बनाया था ...और दी थी चुनौती ..चुनाव की...

क्यों दी थी चुनौती ..चुनाव की ...
इसीलिए ना कि ..उनको भरोषा है ..अपने उस महा भ्रष्ट राजनीतिक तौर - तरीके पर ....
उन्हें विस्वास था ..कि वो अपने छल - प्रपंच और दारु पैसे के आधार पर जीतने नहीं देंगे ...इसीलिए ना ...

पर शायद वो ये भूल गए थे ...कि अपने दंभ में ..आकर उन्होंने किसे चुनौती दे दी ...
अरे जनाब आपको ..चुनौती दे दी ...हमें चुनौती दे दी ....
क्या जीत सकते है ये ....हमारे ही दम पर ...हमको ही बेवकूफ बना ...और हमें - आप से लड़ा ....
नहीं गुजर गया वो दौर ..जब नेता थे वो हमारे ...
खो चुके है वो विस्वास ..और हमारे भाग्य विधाता होने का हक़ ....
अब नहीं ..अब हम समझ चुके है ...अब आप खुद युद्ध में कूद चुके है ....
अब आप कूदे है ..तो हम इन्हे जीतने नहीं देंगे ....

और वैसे भी ....ये जीत नहीं सकते ....पर है आपको ....आपका आमंत्रण ...कि शामिल हो दिल्ली के इस युद्ध में ....ताकि बता सके भविष्य को ....
कि हाँ ...हम हिस्सा थे उस बदलाव का ...जिसने तुम्हे दिया है ....एक समृद्ध राष्ट्र ....और अछय सम्मान ....

दोस्त दिल्ली का चुनाव ..कोई चुनाव मात्र नहीं है ...
ये शुरुवात है ....सच्चे लोकतंत्र की..
ये शुरुवात है ...स्वराज की ....
ये शुरुवात है,... उस समाज की ...जिसे कोई बाँट ना पाये ...आपस में लड़ा भिड़ा नहीं पाये ....
ये शुरुवात है,...उस व्यवस्था की ..जिसमे आपको वो मिले ...जो सही है ...देश के लिए ..आपके लिए ..और आपके बच्चो के भविष्य के लिए .....

जाग चुकी है दिल्ली ....और आप,...जीत चुके हो ये युद्ध ....
4 दिसंबर को तो ये भ्रष्ट राजनीति ....अपनी हार मानेगी ..और
8 दिसंबर को होगा ...जनता की जीत का ऐलान ....उस जीत का ऐलान ...जिसके लिए आप निकले थे अपने घर से ..कभी एक मोमबत्ती और कुछ सपने लेकर .....और मानेगा जश्न आपकी इस जीत और बदलाव कि शुरुवात का 29 दिसंबर को ..उसी रामलीला मैदान में ....जिसमे दिया गया सबसे बड़ा धोखा ....

पर आना है आपको,...
आपको आना है,....इस यज्ञ में ..अपने हिस्से कि आहुति देने ...और दिल्ली वालो को ये बताने कि ....
दोस्त, आप दिल्ली बदलो ....हम देश बदलेंगे .....
अब ना भटकेंगे ...अब ना रुकेंगे ...आप दिल्ली बदलो ....हम देश बदलेंगे ...

आप को आना है ...दिल्ली कि इस रणभूमि से ...एक चिंगारी लेने ....
ताकि जला सके एक ....मशाल ..वहाँ जहां आपका घर है ...और दिखा सके रोशनी उनको जो आपके अपने है ....
बदल सके उनका जीवन ...जिनके लिए आप जीते है .....आना है आपको ..और इसलिए आना है आपको ....

पर युद्ध में आने से पहले ..पैने कर लो ..अपने हथियार ....कर लो तैयारी ..और पढ़ लो स्वराज .....समझ लो स्वराज ..समझ लो RTI ....
मिलेंगे दिल्ली दिल्ली में ...आपको आपके वो साथी ....जिन्होंने थाम रख्खी है ...ये धधनकती मशाल ...जो मिटा रही भ्रष्टाचार के अँधेरे को ....और फैलाएगी ...सदाचार कि रौशनी ....

तो करो तैयारी ...क्योंकि ये है अंतिम आवाज़ ....अंतिम आवाज़ .की ....
बढ़ो ..लड़ो ..और बदल दो तकदीर देश कि ...बदल दो तस्वीर समाज की ....

रखो नीव उस संकल्पना कि जो थी ...शहीद भगत सिंह कि ...आज़ाद की ...शास्त्री और कलाम की .....
हम तैयार है .....आपके स्वागत के लिए दिल्ली में ...हमसे बात करो ....
08588833525
08588833537
08588833534
09873703054
07830398955......
छोड़ो कल की बांते,....कल की बात पुरानी.....
उठो धरा के अमर सपूतो ..पुनः नया निर्माण करो .....नागेन्द्र शुक्ल
Please Provide Your Data @ http://goo.gl/oG1w6e

Download & Read Swaraaj => http://iacmumbai.org/downloads.php?id=Tmc9PQ==
Part 1- https://www.youtube.com/watch?v=kJwvsMy83Lw (Just 7 min, glimpse of Swaraaj)
Part 2- https://www.youtube.com/watch?v=sv5v5qem2l4
Part 3- https://www.youtube.com/

Friday, October 18, 2013

ऐसे बन रही है आम आदमी की पार्टी

राजनीतिक संघर्ष की नयी परिभाषा गढ़ते केजरीवाल


दफ्तर-एआईसी यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत। पता-ए-119 कौशांबी। पहचान-बंद गली का आखिरी मकान। उद्देश्य-राजनीतिक व्यवस्था बदलने का आखिरी मुकाम अरविन्द केजरीवाल। कुछ यही तासीर...कुछ इसी मिजाज के साथ इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले अन्ना हजारे से अलग होकर सड़क पर गुरिल्ला युद्द करते अरविन्द केजरीवाल। किसी पुराने समाजवादी या वामपंथी दफ्तरों की तरह बहस-मुहासिब का दौर। आधुनिक कम्प्यूटर और लैपटाप से लेकर एडिटिंग मशीन पर लगातार काम करते युवा। और इन सब के बीच लगातार फटेहाल-मुफलिस लोगों से लेकर आईआईटी और बिजनेस मैनेजमेंट के छात्रों के साथ डाक्टरों और एडवोकेट की जमात की लगातार आवाजाही। अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते समाजसेवी से लेकर ट्रेड यूनियन और बाबुओं से लेकर कारपोरेट के युवाओं की आवाजाही। कोई वालेन्टियर बनने को तैयार है तो किसी के पास लूटने वालों के दस्तावेज हैं। कोई अपने इलाके की लूट बताने को बेताब हैं। तो कोई केजरीवाल के नाम पर मर मिटने को तैयार है। और इन सबके बीच लगातार दिल्ली से लेकर अलग अलग प्रदेशों से आता कार्यकर्ताओं का जमावड़ा, जो संगठन बनाने में लगे हैं। जिले स्तर से लेकर ब्लाक स्तर तक। एकदम युवा चेहरे।

मौजूदा राजनीतिक चेहरों से बेमेल खाते इन चेहरों के पास सिर्फ मुद्दों की पोटली है। मुद्दों को उठाने और संघर्ष करने का जज्बा है। कोई अपने इलाके मे अपनी दुकान बंद कर पार्टी का दफ्तर खोल कर राजनीति करने को तैयार है। तो कोई अपने घर में केजरीवाल के नाम की पट्टी लगा कर संघर्ष का बिगुल फूंकने को तैयार है। और यही सब भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत[एआईसी] के दफ्तर में आक्सीजन भी भर रहा है और अरविन्द केजरीवाल का लगातार मुद्दों को टटोलना। संघर्ष करने के लिये खुद को तैयार रखना और सीधे राजनीति व्यवस्था के धुरंधरों पर हमला करने को तैयार रहने के तेवर हर आने वालों को भी हिम्मत दे रहा है।

संघर्ष का आक्सीजन और गुरिल्ला हमले की हिम्मत यह अलख भी जगा रहा है कि 26 नवंबर को पार्टी के नाम के ऐलान के साथ 28 राज्यों में संघर्ष की मशाल एक नयी रोशनी जगायेगी। और एआईसी की जगह आम
आदमी की पहचान लिये आम आदमी की पार्टी ही खास राजनीति करेगी। जिसके पास गंवाने को सिर्फ आम लोगो का भरोसा होगा और करने के लिये समूची राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव। दिल्ली से निकल कर 28 राज्यों में जाने वाली मशाल की रोशनी धीमी ना हो इसके लिये तेल नहीं बल्कि संघर्ष का जज्बा चाहिये और अरविन्द केजरीवाल की पूरी रणनीति उसे ही जगाने में लगी है। तो रोशनी जगाने से पहले मौजूदा राजनीति की सत्ताधारी परतों को कैसे उघाड़ा जाये, जिससे रोशनी बासी ना लगे। पारंपरिक ना लगे और सिर्फ विकल्प ही नहीं बल्कि परिवर्तन की लहर मचलने लगे। अरविन्द केजरीवाल लकीर उसी की खींचना चाहते हैं। इसीलिये राजनीतिक तौर तरीके प्रतीकों को ढहा रहे हैं।

जरा सिलसिले को समझें। 2 अक्टूबर को राजनीतिक पार्टी बनाने का एलान होता है। 5 अक्तूबर को देश के सबसे ताकतवर दामाद राबर्ट वाड्रा को भ्रष्टाचार के कठघरे में खड़ा करते हैं। 17 अक्तूबर को भाजपा अध्यक्ष
नितिन गडकरी के जमीन हड़पने के खेल को बताते हैं। 31 अक्तूबर को देश के सबसे रईस शख्स मुकेश अंबानी के धंधे पर अंगुली रखते हैं और नौ नवंबर को हवाला-मनी लैंडरिंग के जरीये स्विस बैक में जमा 10 खाताधारकों का नाम बताते हुये मनमोहन सरकार पर इन्हें बचाने का आरोप लगाते हैं। ध्यान दें तो राजनीति की पारंपरिक मर्यादा से आगे निकल कर भ्रष्टाचार के राजनीतिकरण पर ना सिर्फ निशाना साधते हैं बल्कि एक नयी राजनीति का आगाज यह कहकर करते है कि , "हमें तो राजनीति करनी नहीं आती"। यानी उस आदमी को जुबान देते हैं जो राजनेताओं के सामने अभी तक तुतलाने लगता था। राजनीति का ककहरा राजनेताओं जैसे ही सीखना चाहता था। पहली बार वह राजनीति का नया पाठ पढ़ रहा है। जहां स्लेट और खड़िया उसकी अपनी है। लेकिन स्लेट पर उभरते शब्द सत्ता को आइना दिखाने से नहीं चूक रहे। तो क्या यह बदलाव का पहला पाठ है। तो क्या अरविन्द केजरीवाल संसदीय सत्ता की राजनीति के तौर तरीके बदल कर
जन-राजनीति से राजनीतिक दलों पर गुरिल्ला हमला कर रहे हैं। क्योंकि आरोपों की फेरहिस्त दस्तावेजों को थामने के बावजूद अदालत का दरवाजा खटखटाने को तैयार नहीं है। केजरीवाल चाहें तो हर दस्तावेज को अदालत में ले जाकर न्याय की गुहार लगा सकते हैं। लेकिन न्यायपालिका की जगह जन-अदालत में जा कर आरोपी की पोटली खोलने का मतलब है राजनीति जमीन पर उस आम आदमी को खड़ा करना जो अभी तक यह सोचकर घबराता रहा कि जिसकी सत्ता है अदालत भी उसी की है। और इससे हटकर कोई रास्ता भी नहीं है। लेकिन केजरीवाल ने राजनीतिक न्याय को सड़क पर करने का नया रास्ता निकाला। वह सिर्फ सत्ताधारी कांग्रेस ही नहीं बल्कि विपक्षी भाजपा और बाजार अर्थव्यवस्था के नायक अंबानी पर भी हमला करते हैं। यानी निशाने पर सत्ता के वह धुरंधर हैं, जिनका संघर्ष संसदीय लोकतंत्र का मंत्र जपते हुये सत्ता के लिये होता है। तो क्या संसदीय राजनीति के तौर तरीकों को अपनी बिसात पर खारिज करने का अनूठा तरीका अरविन्द केजरीवाल ने निकाला है। यानी जो सवाल कभी अरुंधति राय उठाती रहीं और राजनेताओं की नीतियों को जन-विरोधी करार देती रहीं। जिस कारपोरेट पर वह आदिवासी ग्रामीण इलाकों में सत्ता से लाइसेंस पा कर लूटने का आरोप लगाती रहीं । लेकिन राजनीतिक दलों ने उन्हें बंदूकधारी माओवादियों के साथ खड़ा कर अपने विकास को कानूनी और शांतिपूर्ण राजनीतिक कारपोरेट लूट के धंधे से मजे में जोड़ लिया। ध्यान दें तो अरविन्द केजरीवाल ने उन्हीं मु्द्दों को शहरी मिजाज में परोस कर जनता से जोड़ कर संसदीय राजनीति को ही
कटघरे में खड़ा कर दिया। तरीकों पर गौर करें तो जांच और न्याय की उस धारणा को ही तोड़ा है, जिसके आधार पर संसदीय सत्ता अपने होने को लोकतंत्र के पैमाने से जोड़ती रही। और लगातार आर्थिक सुधार के तौर तरीकों को देश के विकास के लिये जरुरी बताती रही। यानी जिस आर्थिक सुधार ने झटके में कारपोरेट से लेकर सर्विस सेक्टर को सबसे महत्वपूर्ण करार देकर सरकार को ही उस पर टिका दिया उसी नब्ज को बेहद बारिकी से केजरीवाल की टीम पकड़ रही है। एफडीआई के सीधे विरोध का मतलब है विकास के खिलाफ होना। लेकिन एफडीआई का मतलब है देश के कालेधन को ही धंधे में लगाकर सफेद बनाना तो फिर सवाल विकास का नहीं होगा बल्कि कालेधन या हवाला-मनीलैडरिंग के जरीये बहुराष्ट्रीय कंपनी बन कर दुनिया पर राज करने के सपने पालने वालों को कटघरे में खड़ा करना। स्विस बैंक खातों और एचएसबीसी बैकिंग के कामकाज पर अंगुली उठी है तो सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार पर सरकार के फेल होने भर का नहीं है। बल्कि जिस तरह सरकार की आर्थिक नीति विदेशी बैंको को बढ़ावा दे रही हैं और आने वाले वक्त में दर्जनों विदेशी बैंक को सुविधाओं के साथ लाने की तैयारी वित्त मंत्री चिदबरंम कर रहे हैं, बहस में वह भी आयेगी ही। और बहस का मतलब सिर्फ राजनीतिक निर्णय या नीतियां भर नहीं हैं या विकास की परिभाषा में लपेट कर सरकार के परोसने भर से काम नहीं चलेगा। क्योंकि पहली बार राजनीतिक गुरिल्ला युद्द के तौर तरीके सड़क से सरकार को चेता भी रहे हैं और राजनीतिक व्यवस्था को बदलने के लिये तैयार भी हो रहे हैं।

यह अपने आप में गुरिल्ला युद्द का नायाब तरीका है कि दिल्ली में बिजली बिलों के जरीये निजी कंपनियो की लूट पर नकेल कसने के लिये सड़क पर ही सीधी कार्रवाई भुक्तभोगी जनता के साथ मिलकर की जाये। और कानूनी तरीकों से लेकर पुलिसिया सुरक्षा को भी घता बताते हुये खुद ही बिजली बिल आग के हवाले भी किया जाये और बिजली बिल ना जमा कराने पर काटी गई बिजली को भी जन-चेतना के आसरे खुद ही खम्बो पर चढ़ कर जोड़ दिया जाये। और सरकार को इतना नैतिक साहस भी ना हो कि वह इसे गैर कानूनी करार दे। जिस सड़क पर पुलिस राज होता है वहां जन-संघर्ष का सैलाब जमा हो जाये तो नैतिक साहस पुलिस में भी रहता। और यह नजारा केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट की लूट के बाद सड़क पर उतरे केजरीवाल और उनके समर्थकों के विरोध से भी नजर आ गया। तो क्या भ्रष्टाचार के जो सवाल अपने तरीके से जनता के साथ मिलकर केजरीवाल ने उठाये उसने पहली बार पुलिस से लेकर सरकारी बाबुओं के बीच भी यही धारणा आम
कर दी है कि राजनेताओं के साथ या उनकी व्यवस्था को बनाये-चलाये रखना अब जरुरी नहीं है। या फिर सरकार के संस्थानों की नैतिकता डगमगाने लगी है। या वाकई व्यवस्था फेल होने के खतरे की दिशा में अरविन्द केजरीवाल की राजनीति समूचे देश को ले जा रही है। यह सवाल इसलिये बड़ा है क्योकि दिल्ली में सवाल चाहे बिजली बिल की बढ़ी कीमतो का हो या सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट का विकलांगों के पैसे को हड़पने का। दोनों के ही दस्तावेज मौजूद थे कि किस तरह लूट हुई है। पारंपरिक तौर-तरीके के रास्ते पर राजनीति चले तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। जहां से सरकार को नोटिस मिलता। लेकिन अरविन्द केजरीवाल ने इस मुद्दे पर जनता के बीच जाना ही उचित समझा। यानी जिस जनता ने सरकार को चुना है या जिस जनता के आधार पर संसदीय लोकतंत्र का राग सत्ता गाती है,उसी ने जब सरकार के कामकाज को कटघरे में खड़ा कर दिया तो इसका निराकरण भी अदालत या पुलिस नहीं कर सकती है। समाधान राजनीतिक ही होगा। जिसके लिये चुनाव है तो चुनावी आधार तैयार करते केजलीवाल ने बिजली और विकलांग दोनों ही मुद्दे पर जब यह एलान किया कि वह जेल जाने को तैयार हैं लेकिन जमानत नहीं लेंगे तो पुलिस के सामने भी कोई
चारा नहीं बचा कि वह गिरफ्तारी भी ना दिखायी और जेल से बिना शर्त सभी को छोड़ दे।

जाहिर है अरविन्द केजरीवाल ने जनता की इसी ताकत की राजनीति को भी समझा और इस ताकत के सामने कमजोर होती सत्ता के मर्म को भी पकड़ा। इसीलिये मुकेश अंबानी के स्विस बैंक से जुडते तार को प्रेस कॉन्फ्रेन्स के जरीये उठाने के बाद मुकेश अंबानी के स्विस बैक खातों के नंबर को बताने के लिये जन-संघर्ष [राजनीतिक-रैली] का सहारा लिया। और रैली के जरीये ही सरकार को जांच की चुनौती दे कर अगले 15 दिनो तक जनता के सामने यह सवाल छोड़ दिया कि वह सरकारी जांच पर टकटकी लगाये रहे।

साफ है राजनीतिक दल अगर इसे "हिट एंड रन "या "शूट एंड स्कूट" के तौर पर देख रही हैं या फिर भाजपा का कमल संदेश इसे भारतीय लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश मान रहा है तो फिर नया संकट यह भी है कि अगर जनता ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को चुनाव में खारिज कर दिया तो क्या आने वाले वक्त में चुनावी
प्रक्रिया पर सवाल लग जायेंगे। और संसदीय राजनीति लोकतंत्र की नयी परिभाषा टटोलेगी जहा उसे सत्ता सुख मिलता रहे। या फिर यह आने वाले वक्त में सपन्न और गरीब के बीच संघर्ष की बिसात बिछने के प्रतीक है। क्योंकि अरविन्द केजरीवाल को लेकर काग्रेस हो या भाजपा या राष्ट्रीय राजनीति को गठबंधन के जरीये सौदेबाजी करने वाले क्षत्रपो की फौज, जो सत्ता की मलाई भी लगातार खा रही है सभी एकसाथ आ खड़े हो रहे हैं। साथ ही कारपोरेट से लेकर निजी संस्थानों को भी लगने लगा है राजनीतिक सुधार का केजरीवाल उन्हें बाजार अर्थवयवस्था से बाहर कर समाजवाद के दायरे में समेट देगा। तो विरोध वह भी कर रहा है।

तो बड़ा सवाल यह भी है कि चौमुखी एकजुटता के बीच भी अरविन्द केजरीवाल लगातार आगे कैसे बढ़ रहे हैं। न्यूज चैनल बाइट या इंटरव्यू से आगे बढ़कर घंटों लाइव क्यों दिखा रहा है। अखबारों के पन्नो में केजरीवाल का संघर्ष सुर्खिया क्यों समेटे है। जबकि कारपोरेट का पैसा ही न्यूज चैनलो में है। मीडिया घरानों के राजनीतिक समीकरण भी हैं। कई संपादक और मालिक उन्हीं राजनीतिक दलों के समर्थन से राज्यसभा में हैं, जिनके खिलाफ केजरीवाल लगातार दस्तावेज के साथ हमले कर रहे हैं। फिर भी ऐसे समाचार पत्रों के पन्नों पर वह खबर के तौर पर मौजूद हैं। न्यूज चैनलो की बहस में हैं। विशेष कार्यक्रम हो रहे हैं। जाहिर है इसके कई तर्क हो सकते हैं। मसलन मीडिया की पहचान उसकी विश्वसनीयता से होती है। तो कोई अपनी साख गंवाना नहीं चाहता। दूसरा तर्क है आम आदमी जिस तरह सडक पर केजरीवाल के साथ खड़ा है उसमें साख बनाये रखने की पहली जरुरत ही हो गई है कि मीडिया केजरीवाल को भी जगह देते रहें। तीसरा तर्क है इस दौर में मीडिया की साख ही नहीं बच पा रही है तो वह साख बचाने या बनाने के लिये केजरीवाल का सहारा ले रहा है । और चौथा तर्क है कि केजरीवाल भ्रष्टाचार तले ढहते सस्थानों या लोगों का राजनीतिक व्यवस्था पर उठते भरोसे को बचाने के प्रतीक बनकर उभरे हैं तो राजनीतिक सत्ता भी उनके खिलाफ हैं, वह भी अपनी महत्ता को बनाये रखने में सक्षम हो पा रहा है। और केजरीवाल के गुरिल्ला खुलासे युद्द को लोकतंत्र के कैनवास का ही एक हिस्सा मानकर राजनीतिक स्वीकृति दी जा रही है। क्योंकि जो काम मीडिया को करना था, वह केजरीवाल कर रहे हैं। जिस व्यवस्था पर विपक्ष को अंगुली रखनी चाहिये थी, उसपर केजरीवाल को अंगुली उठानी पड़ रही है। लोकतंत्र की जिस साख को सरकार को नागरिकों के जरीये बचाना है, वह उपभोक्ताओं में मशगूल हो चली है और केजरीवाल ही नागरिकों के हक का सवाल खड़ा कर रहे हैं। ध्यान दें तो हमारी राजनीतिक व्यवस्था में यह सब तो खुद ब खुद होना था जिससे चैक एंड बैलेंस बना रहे। लेकिन लूट या भ्रष्टाचार को लेकर जो सहमति अपने अपने घेरे के सत्ताधारियों में बनी उसके बाद ही सवाल केजरीवाल का उठा है। क्योंकि आम आदमी का भरोसा राजनीतिक व्यवस्था से उठा है, राजनेताओं से टूटा है। जाहिर है यहां यह सवाल भी खड़ा हो सकता है कि केजरीवाल के खुलासों ने अभी तक ना तो कोई राजनीतिक क्षति पहुंचायी है ना ही उस बाजार व्यवस्था पर अंकुश लगाया है जो सरकारों को चला रही हैं। और आम आदमी ठगा सा अपने चुने हुये नुमाइन्दों की तरफ अब भी आस लगाये बैठा है। फिर केजरीवाल ने झटके में व्यवसायिक-राजनीति हितों के साथ खड़े होने वाले संपादकों की सौदेबाजी के दायरे को बढ़ाया है। क्योंकि केजरीवाल के खुलासों का बडा हथियार मीडिया भी है और मीडिया हर खुलासे में फंसने वालों के लिये तर्क गढ भी सकता है और केजरीवाल के हमले की धार भोथरी बनाने की सौदेबाजी भी कर सकता है। यानी अंतर्विरोध के दौर में लाभ उठाने के रास्ते हर किसी के पास है और अंतरविरोध से लाभ राजनेता से लेकर कारपोरेट और विपक्ष से लेकर सामाजिक संगठनों को भी मिल सकता है। यह सभी को लगने लगा है। लेकिन सियासत और व्यवस्था की इसी अंतर्विरोध से पहली बार संघर्ष करने वालों को कैसे लाभ मिल रहा है, यह दिल्ली से सटे एनसीआर के कौशाबी में बंद गली के आखिरी मकान में चल रहे आईएसी के दफ्तर से समझा जा सकता है। जहां ऊपर नीचे मिलाकर पांच कमरों और दो हाल में व्यवस्था परिवर्तन के सपने पनप रहे हैं। सुबह से देर रात तक जागते इन कमरों में कम्प्यूटर और लैपटॉप पर थिरकती अंगुलियां। कैमरे में उतरी गई हर रैली और हर संघर्ष के वीडियो को एडिटिंग मशीन पर परखती आंखें। हर प्रांत से आये भ्रष्टाचार की लूट में शामिल नेताओं के दस्तावेजो को परखते चेहरे। और इन सब के बीच दो-दो चार के झुंड में बहस मुहासिबो का दौर। बीच बीच में एकमात्र रसोई में बनती चाय और बाहर ढाबे ये आती दाल रोटी। यह राजनीतिक संघर्ष की नयी परिभाषा गढ़ने का केजरीवाल मंत्र है। इसमें जो भी शामिल हो सकता है हो जाये..दरवाजा हमेशा खुला है।
Copied from :- http://prasunbajpai.itzmyblog.com/2012/11/blog-post_24.html?m=1

Thursday, October 17, 2013

क्या आप जानते है की,...

क्या आप जानते है की,...
जब अरविन्द जी IRS अफसर थे तब उन्होंने अपने छोटे से ही कार्यकाल में 82 बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर छापे डाले थे और 5 सौ करोड़ से ज्यादा वसूले थे .....ऐसा door to door करते हुए,...एक दूसरे IRS ने बताया,... जो की ...अरविन्द जी को 15 साल से जानता था ....उनके साथ ही ट्रेनिंग की थी ......

जब ऐसा मौका हाँथ लगा ....तो लगे हाँथ ये भी सवाल पूँछ ही लिया ...की क्या अरविन्द जी वैसे ही है ....जैसे हम जानते है ?...उनका जवाब था .....तुम कैसा जानते हो,..नहीं पता ....पर वो जैसे आज है वैसे ही 15 साल पहले थे .....
ऐसी ही देश भक्ति ....ऐसा ही जूनून ....यही जज्बा .....
उन्होंने बोला .....नहीं आप कोई गलती नहीं कर रहे ....अरविन्द को अपना आदर्श मान ....
दोस्त .....बात करो ....सबको बताओ ....की क्या ..कौन और क्यों ....है अरविन्द ....ये भी बताओ ..की AAP का जीतना क्यों जरुरी है ....बात करने से ही बात बनेगी ....हर जगह बात करो ...मेट्रो में बस में ...ऑफिस में, स्कूल में, कॉलेज में , कोचिंग में ...चाय की दूकान, पान की दूकान ...हर जगह ...हर तरफ ....नागेन्द्र

Tuesday, October 8, 2013

क्यों दी गयी थी चुनौती हमें - आपको ....देश के कामकाजी आम आदमी को ,..

दोस्तों, आज समझ आता है की क्यों दी गयी थी चुनौती हमें - आपको ....देश के कामकाजी आम आदमी को ,...

"की संसद में बनते है कानून ...अगर कानून बनाना है तो संसद में आओ ...."
क्योंकि इनको लगता है की राजनीति,..... भ्रष्टाचार का खेल है ...
और उसमे तो ...ये बाबू लोग माहिर है .....

सोंचते थे की जीत लेंगे ..... पर जनता से लडाई में....जीत लोकतंत्र की होगी .... वयस्था जरुर बदलेगी ...और इसकी शुरुवात 8 दिसंबर 2013 को ..दिल्ली से ....होगी .... जरुर होगी .....

बस आपको अपने हिस्से का काम करना है .....अपने घर/ ऑफिस /चाय की दूकान /मेट्रो /बस ,.......कही भी और हर जगह ....बस काम करो ...बस बात करो .... किसी अरविन्द के लिए नहीं .....किसी आम आदमी पार्टी के लिए नहीं ..... "ये लडाई हमें जीतनी है .....अपने लिए ...अपने बच्चो के लिए ...और देश के लिए ..." आज आप चूके ......तो इतिहास को सब पता चलता है .......

निकलो बाहर मकानों से ....जंग करो बेईमानों से ......नागेन्द्र शुक्ल

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